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Praveen Gola

Tragedy

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Praveen Gola

Tragedy

घरेलू हिंसा

घरेलू हिंसा

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रूह में दर्द होता है ,

निशान तो चले जाते हैं ,

घरेलू हिंसा से ना जाने ,

कितने घर सहम जाते हैं।


ऐसी कौन सी मर्दानगी ?

और बाकी रह गई ,

जो पुरूष के बिन हाथ उठाये ,

विवाह बंधन को अधूरा कह गई।


गलती एक ओर नारी की भी है ,

कि वो ये सब क्यूँ सहती है ?

मगर लोक लाज के डर से बेचारी ,

अपने स्वामी को ऊपर कहती है।


पुरूष का यूँ चीखना चिल्लाना ,

बच्चों को भी खराब लगता है ,

वो बेचारा भी ऐसे माहौल से ,

भागने की जद्दोजहत करता है।


जहाँ स्त्री एक ओर अपनी ,

बेवजह की मार से टूट जाती है ,

वहीं पुरूष को दूसरी ओर स्त्री की ,

चरित्रहीन परिभाषा भाती है।


घरेलू हिंसा ऐसा नहीं कि केवल ,

अनपढ़ पुरूष अपना रहे ,

आजकल तो पढ़े लिखे भी इसपर ,

अपनी गहरी मोहर लगा रहे।


कुछ पुरूष का आत्मसम्मान ,

तो कुछ उसका अभिमान ऐसा कर रहा ,

जो पढ़ने लिखने के बाद भी हमेशा ,

नारी को अपने नीचे कर रहा।


ये घरेलू हिंसा तभी रुकेगी ,

जब सरकार इस पर रोक लगायेगी ,

नहीं तो नारी की रोज धज्जियाँ ,

ऐसे ही हवा में उड़ती जायेंगी।


मैं इतना पढ़ी-लिखी होने के बावजूद भी ,

अगर अपने पति की मार सहती हूँ ,

तो बस उसके सम्मान की खातिर ,

मैं खुद के सम्मान की धूमिल छवि में बहती हूँ।


घरेलू हिंसा एक अपराध है ,

इसे कैसे भी करके हमे रोकना होगा ,

नहीं तो इस पुरूष समाज को सदा के लिए 

स्त्री समाज का बहिष्कार करना होगा।


आज अगर इक्कीसवीं शताब्दी के लेखक भी ,

अपनी लेखनी से घरेलू हिंसा का व्याख्यान करेंगे ,

तो नालत है ऐसे पुरूष समाज पर जो ये चाहेंगे , 

कि वो हर दम स्त्री पर अपनी हुकूमत से राज़ करेंगे।|



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