घरेलू हिंसा
घरेलू हिंसा
रूह में दर्द होता है ,
निशान तो चले जाते हैं ,
घरेलू हिंसा से ना जाने ,
कितने घर सहम जाते हैं।
ऐसी कौन सी मर्दानगी ?
और बाकी रह गई ,
जो पुरूष के बिन हाथ उठाये ,
विवाह बंधन को अधूरा कह गई।
गलती एक ओर नारी की भी है ,
कि वो ये सब क्यूँ सहती है ?
मगर लोक लाज के डर से बेचारी ,
अपने स्वामी को ऊपर कहती है।
पुरूष का यूँ चीखना चिल्लाना ,
बच्चों को भी खराब लगता है ,
वो बेचारा भी ऐसे माहौल से ,
भागने की जद्दोजहत करता है।
जहाँ स्त्री एक ओर अपनी ,
बेवजह की मार से टूट जाती है ,
वहीं पुरूष को दूसरी ओर स्त्री की ,
चरित्रहीन परिभाषा भाती है।
घरेलू हिंसा ऐसा नहीं कि केवल ,
अनपढ़ पुरूष अपना रहे ,
आजकल तो पढ़े लिखे भी इसपर ,
अपनी गहरी मोहर लगा रहे।
कुछ पुरूष का आत्मसम्मान ,
तो कुछ उसका अभिमान ऐसा कर रहा ,
जो पढ़ने लिखने के बाद भी हमेशा ,
नारी को अपने नीचे कर रहा।
ये घरेलू हिंसा तभी रुकेगी ,
जब सरकार इस पर रोक लगायेगी ,
नहीं तो नारी की रोज धज्जियाँ ,
ऐसे ही हवा में उड़ती जायेंगी।
मैं इतना पढ़ी-लिखी होने के बावजूद भी ,
अगर अपने पति की मार सहती हूँ ,
तो बस उसके सम्मान की खातिर ,
मैं खुद के सम्मान की धूमिल छवि में बहती हूँ।
घरेलू हिंसा एक अपराध है ,
इसे कैसे भी करके हमे रोकना होगा ,
नहीं तो इस पुरूष समाज को सदा के लिए
स्त्री समाज का बहिष्कार करना होगा।
आज अगर इक्कीसवीं शताब्दी के लेखक भी ,
अपनी लेखनी से घरेलू हिंसा का व्याख्यान करेंगे ,
तो नालत है ऐसे पुरूष समाज पर जो ये चाहेंगे ,
कि वो हर दम स्त्री पर अपनी हुकूमत से राज़ करेंगे।|
