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Vatsal Tripathi

Tragedy


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Vatsal Tripathi

Tragedy


घर और फ्लैट

घर और फ्लैट

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घर की याद बहुत आती है ,

जब मै फ्लैट में रहता हूं ,

बंद दरवाजे और खिड़कियां ,

देख घुटन अब होती है ।


रोज बालकनी में जब आऊं ,

ना चिड़िया ना खुला आसमां ,

बहुमंजिला कई इमारत ,

देख उसे अब मैं घबराऊं ।


लिफ्ट से ऊपर नीचे होता ,

दो कमरे के फ्लैट में ,

पड़ोसी कौन जब नहीं पता ,

रात में देख उसे घबराऊं ,


घर की याद बहुत आती है ,

जब मैं फ्लैट में रहता हूं ।


घर का आंगन कहां मिले अब ,

वो तुलसी का पौधा गायब ,

वो रोज उधम चौकड़ी गायब ,

अकेलेपन से मैं घबराऊं ।


बगल के रिश्ते के चाचा से ,

जो मैंने भी कुछ सीखा था ,

आज पड़ोसी के बंद दरवाजों से ,

अब खुद से ही मतलब रखना था ।


देर शाम जब सड़क पर निकलूं ,

लोग सिर्फ अपने सपनों में थे ,

ना तुम जानो , ना हम जाने ,

बस हमें अकेले रहना था ।


घर की याद बहुत आती है ,

जब मैं फ्लैट में रहता हूं ।




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