एक विधवा स्त्री
एक विधवा स्त्री
तुम्हारे ना होने का उत्सव सा मनाती हूँ,
सुनो, तुम को तो पता है ना कि मैं कैसी हूँ ?
ऐसा नहीं है कि मैं तुम्हें प्यार नहीं करती थी,
पर मैं तुम्हें प्यार अब भी करूं,
शायद यह दुनिया को मंजूर नहीं,
मेरे आंसुओं से तुमसे प्रेम की गवाही चाहते हैं।
सच है कि अब मुझे हर बात पर रोना नहीं आता।
नम कोरों को भी बखूबी
हँसते हुए आँसू का नाम दे जाती हूँ,
तुम मेरी कमजोरी जरूर थे कभी,
पर ये भी सच है कि मुझसे दूर होकर,
तुम मेरी ताकत बन गये।
तुम्हारे जाने के बाद एकदम से मैं बेचारी बन गयी,
जिन्हें फूटी आँख न भाती थी,
उनके भी "च्च,च्च,च्च " की भागीदारी हो गयी,
सब आये रोये, धीरज धराये और चले गये,
कोई नहीं ठहर पाया जैसे ठहरे हो तुम मुझ में,
बस बची रह गयी तो मैं और ना होकर भी तुम।
महीनों तड़पती रही यादों में तुम्हारी,
कभी सुबह आते न्यूज़ पेपर दहलाते,
तो कभी अनायास बज उठता तुम्हारा फोन डराता,
बहुत भारी होता था कहना कि "तुम अब नहीं रहे।"
चाय तो मैं अभी भी दो कप ही बनाती हूँ,
नाश्ता भी तुमसे पूछ ही मन में दोहराती हूँ,
हमेशा तुमको अपने आसपास पाती हूँ ,
माँग में सिंदूर तो नहीं पर हाँ बिन्दी जरूर लगाती हूँ,
और आंखों का काजल तो आज तक मिटा नहीं पाती हूँ।
अपनी साड़ियां के चटक रंगों से चटकती,
लोगों की आँखों को नजरअंदाज कर देती हूँ,
और तुम्हारे लाये हर परिधान में बेपरवाह सज लेती हूँ,
सब की निगाहें ढूँढ़ती है वज़ह मेरी खुशियों की,
पर तुम तो समझते हो ना कि मेरी हर वज़ह तुम ही हो।
हर शाम घर बिखेरने लगती हूँ जैसे तुम बिखेरते थे,
कभी कुशन जमीन पर,
पानी की बोतल कहीं ढक्कन कहीं,
तौलिया भी गीला कर फैंक देती हूँ यूँ ही कहीं।
देर रात उठ कर चाय भी बनाती हूँ दो कप,
और घंटों बड़बड़ाती हूँ कि तुम कभी नहीं सुधरोगे।
देर तक ऐसी चलाती हूँ और जब छूटने लगे कंपकपी,
तो गुस्से से तुम्हारे रेक लाइनर को आँख दिखाती हूँ ,
तुम दिखते हो मुझे ठंड से सिकुड़ते हुए अब भी,
तुम्हें हल्का कम्बल ओढ़ा खुद भारी कम्बल में लिपट जाती हूँ।
फिर नयी सुबह घर समेटने में बिताती हूँ,
सच में तुमसे कभी दूर नहीं हो पाती हूँ,
घर बाहर सब में तुम संग रम जाती हूँ,
और चुभती नजरों को अनदेखा कर,
तुम्हारे ना होने में भी सिर्फ और सिर्फ तुमको पाती हूँ ।।
