STORYMIRROR

Dr Baman Chandra Dixit

Abstract Tragedy

4  

Dr Baman Chandra Dixit

Abstract Tragedy

एक उम्मीद टूटी हुई।

एक उम्मीद टूटी हुई।

1 min
363


एक टूटी हुई छोटी उम्मीद हूँ,

मत पूछो मेरी ख्वाहिशों की।

किसी रूठी हुई तकदीर से

बरबाद चंद एहसासों की।।


वो भी खयाल था बड़ा सुहाना सा,

जो घायल दिल में भी पलता था।

तूफ़ां से उजड़ा टूटा शाख में भी,

एक पत्ते की लाश सा डोलता था।

बरबादी के बाद शांत समीर भी

कोशिश ना कि, सहलाने की।।


फ़िर भी होंठों को चाटता रहा,

उम्मीद की बूंदों के तलाश में ।

कुछ स्वादों को फ़रियाद किया,

रस घुलने की शुष्क प्रयासों में।

हर बार प्यास ही प्यास मिले,

जब जब पीने की कोशिश की।।


मेरे प्यास भी बड़े अजीब हैं,

पहचानते सारे इशारों को।

तड़पते अगर कोई चोट कभी,

दर्द भी सहलाते ख़राशो को।

दबे आवाज़ में कराहती चीखें

होंठ मिटा देते चित्र चीत्कारों की।।


मेरे नैनों से बहते धारों को,

मालूम होता बंदिशें कितनी।

कभी पलकों ने रोक रखा रास्ता,

कभी हथेली में समाये जितनी।

कभी और अगर बह निकलते

होंठ पी लेते जो बचते बाकी।।


अब कहता हूं सुन ऐ सहर!

कल सांझ से अंधेरा पिता हूँ।

मरना नहीं ठान ली है मैंने

सांस संजो कर अब जीता हूँ।

तेरी फिक्र का हर जिक्र जाहिर

परवाह ना कर मेरी साँसों की।।

बरबाद चंद एहसासों की ।।



Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract