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Phool Singh

Tragedy Fantasy Thriller

4  

Phool Singh

Tragedy Fantasy Thriller

एक मसीहा

एक मसीहा

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एक मसीहा उभर के निकला, ज्ञान के जिसका विस्तार नहीं

स्थिति बदलने देश की निकला, कोई भी उसके साथ नहीं।


शेर की जैसी दहाड़ थी उसकी, जो झुकने को तैयार नहीं

धरे रह गए तर्क-वितर्क भी, कलम से तेज तलवार नहीं।


कितने देशों का संविधान पढ़ा वो, किसी को ये अनुमान नहीं

ज्ञान भंडार वो चलता-फिरता, तब उसके जैसा इंसान नहीं।


उद्धारक बना वो उस समाज का, ईश्वर जिनके साथ नहीं  

अत्याचार ओर बढ़ते जाते, दया-धर्म की उनसे बात नहीं।


महापुरुष तो हुए बहुत से पर, उद्धारक उसके जैसा नहीं

देव बन रहा धीरे-धीरे, “भीम” बिना कल्याण नहीं।


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