दया धर्म का मूल
दया धर्म का मूल
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दया धर्म का मूल है, जाने सब जग ये
मानव की पह्चान दया, सात्विक गुण है ये
सृष्टि रचाई ईश्वर ने, गुण भरे मानव हिय में
विस्मृत हुआ जीवन सार, उलझा माया जाल में
जहाँ दया वहाँ ईश्वर, जहाँ लोभ वहाँ पाप
दया करें निस्वार्थ भाव, बिन देखे हानि लाभ
औरों का दुख देख, नीर हो नैनों में
मानव लिप्त लालच, मोह, अहंकार में
बिन दया जीवन, हिंसक पशु समान
न अपना पराया जाने, सर्वोत्तम है परोपकार
दया से जो अभिभूत, ईश्वर का प्रिय है वह
जीवन का आधार दया, हर धर्म की नींव है यह
त्याग हो भेद भाव, द्वेष जब, तभी दया संभव
दूर अभिमान किये बिना, हो न सके दया संभव
हो सामाजिक उत्थान, फैले खुशबू दया की
पढे पोथी वह ज्ञानी नहीं, दया करे है वह ज्ञानी
पोंछें आँसू औरों के, बने ईश्वर के प्रिय
पूजा पाठ आडम्बर पाखंड में लीन है संसार
दया है धर्म का मर्म, दया है उत्तम कर्म
समझो धर्म का अर्थ, दया बिन जीवन है व्यर्थ
मिटे कलुष मन का, मिले सुख शांति मन की
धर्म सिखाए दया, प्रेम, त्याग, स्वर्ग का द्वार यही.
