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Pawanesh Thakurathi

Classics

3  

Pawanesh Thakurathi

Classics

दूरियाँ

दूरियाँ

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ज्यों-ज्यों हम आगे बढ़ रहे हैं

बढ़ रही हैं दूरियाँ

आदमी से आदमी के बीच की।


आदमी कटता जा रहा है

अपने समाज से

अपने परिवार से

सच तो यह है कि

खुद के लिए भी उसके पास

अब समय नहीं रहा।


कभी-कभी तो लगता है

आदमी अब आदमी नहीं रहा

जब-जब दिखती हैं

भावनाएँ- संवेदनाएं

उसके भीतर से गायब होती हुई।


भौतिक साधनों को जुटाने की होड़ में

आदमी भागता जा रहा है

अपनों से दूर

वह अब नहीं करता

अपनों से मिलने की कल्पना

वह अब नहीं रखता

अपनों के प्रति लगाव।


समय की धुरी पर

घूमता हुआ आदमी

अब दूरियों

के बीच जीने का आदी हो गया है।


दूरियाँ

जो अब बढ़ती जा रही हैं

बेल की तरह

दूरियाँ

जो खत्म होने का

नाम ही नहीं लेतीं।


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