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Vijay Kumar parashar "साखी"

Inspirational


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Vijay Kumar parashar "साखी"

Inspirational


"दुःख, संघर्ष"

"दुःख, संघर्ष"

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जब न मिलता है, कोई विकल्प तब चलता है, दिमाग का बल्ब

गर न मिलता, फूल को संघर्ष

कैसे पाता फूल, शूल बीच हर्ष?

वो ही आदमी बनता है, उत्कर्ष

जो गम बीच खिलता है, सहर्ष

जो गर न मिलता, दुःख का वर्ष

सुख का कैसे महसूस होता, वर्ष?

पर मनुष्य बड़ा है, आलसी फर्श

जब तक न महसूस करे, दुःख, दर्द

तब तक न करता है, वो कोई कर्म

कहता है, साखी जीवन में बने, कर्ण

परिस्थिति कोई भी ही, निभाये फर्ज

जितना जलेगा कोई दीपक, आदर्श

उतना फैलाएगा वो, प्रकाश सहर्ष

बिना संघर्ष न बनता है, कोई मर्द



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