Rochana Singh
Abstract
वो फिर से लगे याद आनें
जिनको भूलने में लगे जमाने,
आसमां को हवा चाहिए और
पक्षी को क्या चाहिए,
वक्त चेहरे पर क्या लिख गया
आईना देखना चाहिए।
क्यूं किनारे-किनारे चलूं
भीड़ में रास्ता चाहिए
दिल बहुत दिनों से तड़पा नहीं
जख्म कोई नया चाहिए।
वो पागल सा लड...
यादें
वक्त कहां एक ...
इश्क़ हुआ मुझ...
सफ़र
समय कभी एक सा...
यादों का शहर
मोहब्बत आफ़त ...
अब प्यार नहीं...
जिन्दगी कैसी ...
इसलिए झूठी सही मल्लिका से मुलाकात लिखो। इसलिए झूठी सही मल्लिका से मुलाकात लिखो।
मेरे कवि को सम्मान दिलाने के लिए मै, कागज़ पे लिखकर खत्म हो जाती हूं। मेरे कवि को सम्मान दिलाने के लिए मै, कागज़ पे लिखकर खत्म हो जाती हूं।
क्यों करें विधि के विधान से खिलवाड़ क्यों करें विधि के विधान से खिलवाड़
हमारी कहानी का लिखना , किस पन्ने पर शुरू होगा हमारी कहानी का लिखना , किस पन्ने पर शुरू होगा
नाक में नथनी पांव में बिछिया। खड़े हैं पिया हाथों में लिए सिंदूर की डिबिया। नाक में नथनी पांव में बिछिया। खड़े हैं पिया हाथों में लिए सिंदूर की डिबिया।
हर मतभेद को झट से सुलझा दे, वो शांति की राह है हिंदी। हर मतभेद को झट से सुलझा दे, वो शांति की राह है हिंदी।
इसीलिए कहती हूँ, कोई नहीं है इसके जैसा इसीलिए कहती हूँ, कोई नहीं है इसके जैसा
अब मुक्ति पाने को मन करता है! अब मुक्ति पाने को मन करता है!
साथ तुम्हारे जो बीता सुकून भरा बचपन साथ तुम्हारे जो बीता सुकून भरा बचपन
माता के दरबार में, सच्चा भक्त जो आएगा माता के दरबार में, सच्चा भक्त जो आएगा
हर शब्द में है अपनापन, खुश होता इसे सुन मन हर शब्द में है अपनापन, खुश होता इसे सुन मन
सादगी का कोई मोल नहीं श्रृंगार बिन पैसे कोई योग नहीं" !! सादगी का कोई मोल नहीं श्रृंगार बिन पैसे कोई योग नहीं" !!
मालिक शोषण करता जाये, बोल कहां ये पाते है? मालिक शोषण करता जाये, बोल कहां ये पाते है?
पैरों में चप्पल न हो परवाह नहीं, किसके आसपास से गुजरे पता नहीं। पैरों में चप्पल न हो परवाह नहीं, किसके आसपास से गुजरे पता नहीं।
अंधेरे में जो जलाए रखे दीप, सवेरा उसी का होता है गहरा। अंधेरे में जो जलाए रखे दीप, सवेरा उसी का होता है गहरा।
अंतर मन शीतल हो झांके। चंदन का टीका सर साजे। अंतर मन शीतल हो झांके। चंदन का टीका सर साजे।
कान्हा की सुखद स्मृतियाँ, वृंदावन को पावन करती। कान्हा की सुखद स्मृतियाँ, वृंदावन को पावन करती।
नमक सा हो स्वभाव नमक सा हो स्वभाव
उससे तो कुछ छिपा नहीं है, तेरे राज हों या हों मर्म। उससे तो कुछ छिपा नहीं है, तेरे राज हों या हों मर्म।