STORYMIRROR

मधुशिल्पी Shilpi Saxena

Abstract Tragedy

3  

मधुशिल्पी Shilpi Saxena

Abstract Tragedy

दर्द

दर्द

1 min
35

क्यूँ धुँध मे ये ज़िंदगी खो रही है!

उजालों के बावजूद तिमिर मे खो रही है!!


है खुशियों का मेला फिर भी दिल अकेला!

चाँद की बाहों मे क्यों चाँदनी रो रही है!!

   


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract