STORYMIRROR

Ajay Singla

Abstract

3  

Ajay Singla

Abstract

दोस्ती

दोस्ती

1 min
241

मेरे घर में पार्टी थी

काम बहुत सा था पड़ा

कोई मेरे साथ न था

चिंता में था मैं खड़ा।


टेंट वाला, खाने वाला

काम मुझको कह गया

काम कुछ मैं कर न पाया

सोचता मैं रह गया।


मदद किसकी लूं और कैसे

बातों में थे सब लगे

धड़कने बढ़ने लगे

महमान जब आने लगे।


तभी मेरा एक साथी

जाने कहाँ से आ गया

मेरा सारा काम लेकर

झट से वो निबटा गया।


मेरे में भी हिम्मत आयी

जोश उसने भर दिया

मेरी उसकी जुगलबंदी

काम सारा कर दिया।


एक वो और एक मैं

हम दोनों ग्यारह हो गए

बात करते रात हो गयी

थक के हम तब सो गए। 


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract