दो लोग आए थे।
दो लोग आए थे।
दो लोग आए थे
कंधों पर बैग और हाथों में झोले लिए
आंखों में आँसू और मुख पर चिंता लिए हुए
एक छोटा सा कमरा लिए हुए
कोई रोजगार नहीं था उनके पास
जेबों में पैसा नहीं था उनके पास,
प्रश्न खाने का, जवाब नहीं था उनके पास।
जान दांव पर लगाकर,
परिवार को थोड़ा ज्यादा देने की चाहत में
सिमेंट के कारखाने में मजदूरी करते थे वो
गुनाह बस इतना था कि उन्होंने भरोसा किया
सारी कमाई कोई धोखेबाज ले कर गया।
अब कहाँ जाएं वो, किसकी मदद ले वो
घर पर कोई इंतजार में घड़ी गिन रहा होगा।
काश कोई मुसीबत का भी साथी होता,
ऊपर वाले में असीम श्रद्धा थी
रोज काम की तलाश जारी रहती,
पर कई दिनों से जाने वो कहाँ हैं
जो कुछ लाए थे बिना ताले के कमरे में पड़ा है
मेहनत और ईमानदारी का तोहफा देखा मैंने आज
हमारे देश के मजदूर थे वो,
जहाँ भी होंगे वो स्थान किसी मंदिर से कम न होगा।
