“दो घरों के बीच”
“दो घरों के बीच”
घर में माँ–बाप की थकी दुआएँ हैं,
बीवी की आँखों में अनकही बातें हैं,
बेटी की हँसी, बहन का भरोसा,
इन सबका बोझ मेरे कंधों पे आता है।
कमाने निकला हूँ तो घर छूट जाता है,
घर में रहूँ तो सपना टूट जाता है,
पैसा ज़रूरी है, ये सच मान लिया,
पर सुकून क्यों हर रास्ते खो जाता है?
हर रोज़ खुद से यही सवाल करता हूँ,
मैं जी रहा हूँ या बस निभा रहा हूँ,
अपनों के लिए सब कुछ दे दिया मैंने,
फिर भी खुद को खाली सा पाता हूँ।
