STORYMIRROR

Aradhana Kanchan

Abstract

4  

Aradhana Kanchan

Abstract

दीवाली ही तो है

दीवाली ही तो है

1 min
433

दीवाली ही तो है

दिए जलें या नफरत

क्या फर्क पड़ता है।


दीवाली ही तो है

चिराग रोशन हों या

रिश्ते क्या फर्क पड़ता है।


दीवाली ही तो है

घर जगमग हो या

अपनों के दिल

क्या फर्क पड़ता है।


दीवाली ही तो है

रंगों की रंगोली हो या

किसी की हंसी की

क्या फर्क पड़ता है।


दीवाली ही तो है

घर साफ हों या सबके मन

क्या फर्क पड़ता है।


दीवाली ही तो है

पटाखों की चमक हो या

किसी की आंखों में खुशी की

क्या फर्क पड़ता है।


दीवाली ही तो है

मिठाई की मिठास हो या

अपनों के प्यार की

क्या फर्क पड़ता है

हां दीवाली ही तो है।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract