धूप-छाँव
धूप-छाँव
जिंदगी इंसान की
कुछ इस तरह बदल गई
कब सुख दुख आया
यह सोचती ही रह गई।
अजीब माया है प्रभु की।
चाहते हैं वह मिला नहीं
जो मिला वह चाहा नहीं
जिंदगी कभी रुकी नहीं।
प्रकृति व मानव
पूरक एक दूजे के
अधूरे हैं दोनों ही
एक दूजे के बिन।
किस्मत को खुद बिगाड़ा
दोष प्रकृति पर डाला
मन से किए होते प्रयास
जिंदगी में न रहती आस।
कहीं धूप कहीं छाया
अजीब मंजर है छाया
जीवन को रोक न पाया
हर पल बढ़ते ही पाया।
