STORYMIRROR

विनीता धीमान

Inspirational

3  

विनीता धीमान

Inspirational

धूमिल आवरण

धूमिल आवरण

1 min
288

कब समझोगी ख़ुद को

तुम एक औरत ही नहीं


चलती फिरती मशाल हो

नोच डालो अपने ऊपर के

इस धूमिल आवरण को 

जो राह तुम्हे भटकाता है।  


अपने कदमों को पहचानो

अपनी गति को समझो

तोड़ डालो इन जंजीरों को

तुम भारत की नारी हो


अपनी पर आ जाओ तो

इस दुनिया पर भारी हो


अभी तक चारदीवारी में कैद थी 

अब अपने हौसले के साथ

न रुकना न ठहरना

जब तक मंजिल न मिले

तब तक चलते रहना


देख लेगा ये ज़माना

तेरे मजबूत इरादों को।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Inspirational