धरती........
धरती........
धरती झूमें, मनोहरी, हरिभरी लहलहाती थी।
पशू-पक्षी,पेड़-पौधो संग इठलाती-बलखाती थी।
खुद़गर्ज़ मानव ने कुचल के रख दिया प्रक्रुती के सारे रंग
कैसे प्रक्रुति निभा लेती ऐसे दुष्ट खुद़गर्ज़ो संग
बांध टूटा सहनशीलता का तो प्रक्रुति का प्रकोप बरसा
भोगे मानव प्रक्रुति का तांडव हो रहा है जिसे एक अरसा
पशू-पक्षी पेड़-पौधें ये प्रक्रुति की अनमोल धरोहर
फुल, गिलहरी,चिड़िया,मोर हास्य बिखेरतें अधरोंपर
प्रक्रुतिका नज़ारा जितना प्यारा और मोहक दिखे।
उतना ही और वैसे ही उसे ज़तन करना ये अब तो मानव सीखे।
