STORYMIRROR

gyayak jain

Abstract

4  

gyayak jain

Abstract

तरक्की

तरक्की

1 min
544

अरे छोड़ो वो किस्से जो कभी अंजाम न होंगे

तरक्की से लदे इन पैरों पर कितना दूर तुम जाओगे।


कभी सोचा की मैं क्या कर सकूँगा बेहतरी से

या बचपन से ही चलता रहा तू, उन सलाहों के दम पे।


देख तो मस्तक उठाये, दहकते आफ़ताब को

मंजिल भी वही होगी, जो तरीके तुम बनाओगे।


उनके अलग से थे, हमारे भी अलग होंगे,

किसी के पैरों से चलके, कभी मैदान, पार नहीं होते।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract