STORYMIRROR

Aditya Neerav

Inspirational

4  

Aditya Neerav

Inspirational

दास्ताँ बीते दिनों की

दास्ताँ बीते दिनों की

1 min
340


दास्ताँ बीते दिनों की 

खुद में उलझा सा 

खामोश था मैं 

कुछ कहना तो दूर 

लिखना भी

बंद कर दिया मैंने

शायद वक्त

हाथ की लकीरों की तरह 

आड़ी तिरछी हो गई 

जहां भाग्य रेखा को 

ढूंढ़ पाना

मुश्किल हो रहा 

उस पल में कर्म ने 

अपना चमत्कार दिखलाया 

पुनः इच्छाशक्ति 

जागृत होकर 

ललाट कि आभा बन गई...


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Inspirational