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Aditya Neerav

Abstract

4.3  

Aditya Neerav

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बेटियां

बेटियां

1 min
360


छोटी सी उम्र में काम करने लग जाती हैं

बोझ ज़िन्दगी का ढोना सीख जाती हैं 


चूल्हा-चौका, बर्तन-बासन

सब खेलने के उम्र में ही 

सीख जाती हैं बेटियां 

पढ़ने के उम्र में ही 

'दादी अम्मा' बन जाती हैं 


कांटों भरे इस डगर में 

खुद को संभालना भी सीख जाती हैं 

रिश्ते के हर मर्म को 

बख़ूबी समझने लग जाती हैं

सब जीते हैं अपना 'बचपन'


आखिर क्यों बलिदान देती हैं 

केवल और केवल बेटियां।    


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