दान
दान
दान के समतुल्य जग में, वित्त दूजा है नहीं।
दान की सद्वृत्ति प्यारे, त्याग करना तुम नहीं।
दान भूषण हस्त का है, स्वर्ण का कंकण नहीं।
दान से ही सृष्टि में यह, सोहती है निज मही॥१॥
नित्य नदियाँ दान करती, जल स्वयं पीती नहीं।
फल सभी निज वृक्ष देते, भोग खुद करते नहीं ।
मेघ धरणी को भिगोते, कुछ कभी लेते नहीं ।
दान की शुभ रीति जग से, दूर तुम करना नहीं॥२॥
वित्त की गति श्रेष्ठ जग में, शास्त्र कहते दान है।
जो निखारे मान नर का, फिर बने पहचान है ।
लोकहित शुभ साधने को, दान श्रम का भी सही।
सौख्य पाकर दान से नित, खेद उर रहता नहीं॥३॥
कर्ण था अति वीर योद्धा, वीरता थी दान में ।
दे कवच कुंडल खुशी से, वीरता की शान में ।
नाम पाया दान के बल, इंद्र था याचक बना ।
पुत्र रक्षा चाहता था, चित्त में था भय घना॥४॥
थे दधीची दिव्यदानी, अस्थि दे दी शान से ।
वृत्र का संहार करने, वज्र साधा ध्यान से ।
हैं अमर वे दान कर्त्ता, अब अमर थे सब सुखी।
दान से भय काट डाला, वृत्र से थे जो दुखी॥५॥
