चूल्हे की रोटी
चूल्हे की रोटी
आजकल भिन्न-भिन्न आटे की रोटियाँ बनती,
रोटियाँ विभिन्न आकार एवं प्रकार की बनती,
अलग-अलग आटों के मिश्रण से रोटियाँ बनती,
पर अब ना चूल्हे की रोटी की महक ना ख़ुशबू आती,
जो रोटियाँ हाथों से थाप कर माँ बनाती थी।।
उस दौर में खान-पान की अलग पद्धति थी,
खुले में चूल्हा था जिस पर रोटी बनती थी,
चूल्हे के इर्द गिर्द सब बैठ जाते मारकर पालथी,
घी,गुड़ से सनी बाजरी की मोटी रोटी माँ परोसती,
जिसकी ख़ुशबू वातावरण में भी महक उठती।।
सब कहते बाजरी भारी हैं जल्दी से पचती नहीं,
पर हमें तो बाजरे की रोटी आराम से पच जाती,
पहले खानपान सरल था चीजें ना थी दुनिया भर की,
आज भी बुजुर्गों को देखो तो ये बात जरूर समझ आती,
कि क्यों उनकी मजबूत हड्डियाँ और अच्छी खुराक आज भी।।
चूल्हे पर माटी का तवा चढ़ा नीचे डालते थे लकड़ी,
फूँकनी से फूंके मार मार के माँ उस चूल्हे को जलाती,
धुएँ से आँखें लाल हो जाती पर फिर भी घूँघट लेती,
मिट्टी के आँगन में देशी घी की महक बस यादें बाकी,
खाना रोज खाते पर वो स्वाद ना लौट पाया कभी।।
