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Surendra kumar singh

Abstract


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Surendra kumar singh

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चंचल शाम

चंचल शाम

1 min 211 1 min 211

यूँ तो शामें चंचल होती हैं

आती हैं और रात के आगोश में

समा जाती है

अपने सपने के साथ

पर आज की ये शाम कुछ खास है

ठहर गयी है इसकी चंचलता

घिरा गया है जिस्म शाम से

आंखों में उसी के नजारे हैं

धड़क रहा है दिल उसके रंग की संगति पर

घोल दिया है शाम ने हवा में अपनी खुशबू

रोज हम उसका इंतजार करते थे

आज हमारी मेजबानी कर रही है

ठहरी ठहरी सी।


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