चलते चलते
चलते चलते
ख़ुमार कैसा छाया वक्त़ है कैसा आया,
कोरोना निगल रहा है,सभी को चलते-चलते।
पहिए सारे जम गए,पैर हैं सारे थम गए,
आज ज़िंदगी सारी कैद हुई,
नजदीकियां है आज बैर हुई,
तेज सूरज भी है आज रुक गया ढलते-ढलते,
कोरोना निगल रहा..........,
चारों दिशा तांडव हो रहा,दर्द से इंसान रो रहा,
माँ अपनी संतान को मरते देख तड़प रही,
दुनिया में बस लाशें ही लाशें दिख रही,
इक माँ का बेटा बचा है आज मरते-मरते!
कोरोना निगल रहा..........,
सड़के सारी सूनी पड़ी,जनता घरों में कैद खड़ी,
वक्त का पहिया रुक गया,
दुनिया से जैसे इंसान सारा मिट गया,
तबाही से ज़िंदगी है बची आज जलते-जलते !
कोरोना निगल रहा, सभी को चलते-चलते।
