छूटा शहर
छूटा शहर
जा रहा हूँ छोड़ कर शहर
चाहता हूँ रोक ले कोई ठहर
पहरा है शामों सहर
फैला है कैसा ज़हर
फिरता था गली गली
ठेला लिए
आवाज़ें लगाता था
कबाड़ीईईई...
आज वीरान है हर सड़क
घर में हर कोई दुबक
इंसान है पिंजरबद्ध
वायरस से हो रहा युद्ध
मरघट सा है मंज़र
लग गईं किस की नज़र
पेट के ख़ातिर आया था
गाँव में कलेजा छोड़ आया था
जा रहा हूँ ठेले पर लादे
जीवन के सपनों को बाँधे
गठरियों में ...
मोटरियों के ढेर पर बैठी
मुन्ना ,मुनिया और लुगाई
चुप चाप उदासी ओढ़े,
न जाने
कितने दिनों में गाँव
पहुँचना होगा...
मीलों का रास्ता
ठेले पर तय करना होगा
कुछ साथी पैदल ही
हिम्मत को बाँधे माथे पर
चल दिए भूखे प्यासे
बेबस लाचार ठगे से
पैदल ही बेपरवाह छाले लिए
गाँव की ओर
साफ हवा में साँस लेने
अपनों के साथ जीने
खींचते ठेले बहाते पसीने
चले जा रहे ...
पेट की आग बुझाने
उम्मीद को रख सिरहाने
बेहतर कल को खोजने।
