STORYMIRROR

Kavita Sharrma

Abstract

4  

Kavita Sharrma

Abstract

चांदनी

चांदनी

1 min
279

प्रकृति की छटा निराली है

कभी सूरज की लालिमा से सिंदूरी सी दिखती है

कभी स्वर्णिम सी हो जाती है

संध्या में चांद की चमक से

आकाश में चांदनी बिखर जाती है

चारों ओर शीतल पवन बहने लगती है

सुमंद सुगंध सी, मन को हर्षित करती है

तरू भी झूम झूम कर खुशी प्रकट करते हैं

पंछी अपने नीडों में विश्राम करते हैं 

सभी दिशाएं मानो आनंद मग्न हो जातीं हैं

प्रेमी युगलों के लिए यादगार घड़ियां बन जाती हैं

नदि की तरंगों पर चांदनी जब पड़ती है

श्वेत चुनर मानो प्रकृति तब ओढ़ लेती हो।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract