बरगद
बरगद
यादों के साए में कही संग संग है,
वो एक बरगद का पेड़,
झूले थे जिसकी लताओ में,
दोस्त बचपन में संग संग।
उस बरगद की छांव,
जो दे जाती थी राहत,
उस तपती दुपहरिया में,
ले कर,स्नेह की फुलवरिया में।
उस बरगद से निकलती,
वो प्रेम भरी आवाज,
जो दे जाती थी असीम स्नेह,
शायद सुन पाते थे तब हम।
जब हम नासमझ थे,
हमारी तोतली बाते वो जानता था,
और हम सुनते थे,
उसकी मौन की वाणी,
जब सिखा देती थी लताएं,
अजर,अमर प्रेम की कहानी,
संग संग एक प्यारी कहानी।
उम्र के साथ बरगद,
और विशाल बन गया,
और हम कुछ अधिक समझदार,
तभी तो आज,
वह बरगद की छांव नहीं,
वह प्रेम नहीं,
वृक्ष काटने भाते हैं,
हां, खो गया मेरा वो बरगद का पेड़ भी,
विकास की उस आंधी में,
पर उसकी आत्मा को आवाज आज भी आती है,
पुकारती है,दुलराती है,
और पूछती है क्यों, आखिर क्यों ?
खुद को खोखला करे,
ऐसा विकास क्यों ?
