STORYMIRROR

Deepali Mathane

Abstract

3  

Deepali Mathane

Abstract

बिंदिया

बिंदिया

1 min
479

ये जो तेरी बिंदिया है तेरे माथे का साज सजाती है

अपने संस्कारों का परिचय जिस दिन मुझे कराती है


चाॅंद जैसे मुखडे पे हर पल चाॅंदनी सी चमकती है

अपने संस्कारो के मोतियों से पल पल महकती है


साज-शृंगार को तुम्हारे नीत चार चाँद लगाती है

लाल रंगकी छोटी बिंदिया हर रंग को अपनाती है


वादा है ये जनम-जनम का सात जन्मों के वचन निभाती है

महकें घर-ऑंगन जिसकी खुशबू से वो ऐसा रूप दिखाती है


हर सुहागन के माथे पर सिंदुर की लाली बनके चमकती है

तेरी बिंदियाॅं मेरे वजूद का हिस्सा बन माथे पर ही दमकती है.


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract