बिहार क्यों मायूस हैं ?
बिहार क्यों मायूस हैं ?
✅बिहार क्यों मायूस है?✊💯
वो धरती जहाँ चाणक्य ने कलम चलाई,
जहाँ नालंदा की लौ कभी बुझ न पाई।
जहाँ बुद्ध ने पाया था निर्वाण का राज़,
आज वहाँ दिखता है बस धूल और साज़।
गुरुकुलों की गलियों में अब सन्नाटा है,
कभी ज्ञान की गंगा थी, अब प्यासी घाटा है।
सड़कें टूटी, आँखें सूनी,
आशाओं पर चढ़ी धुंध कुछ धुंधली, कुछ धुंधी।
खेतों में मेहनत, पर बाज़ार दूर,
शब्दों में वादे, पर सच्चाई कमज़ोर।
हर मौसम में पसीना बहाया किसान ने,
पर मुनाफा मिला दलाल और दुकान ने।
युवाओं के कंधे मज़बूत बहुत,
पर काम नहीं, बस जज्बातों का सबूत बहुत।
छोड़ के घर, जाते हैं शहर,
दिल में हो उम्मीद, पर चेहरे पे डर।
ट्रेनों में लदी हैं उनकी कहानियाँ,
जेब में डिग्री, पर खाली हैं ज़िंदगियाँ।
राजनीति की बिसात पे मोहरे वही,
विकास की चाल में चालाकी कहीं।
जाति के नाम पर बंटता ज़मीर,
बनता है हर वक़्त नया सा तीर।
नेता बदलते हैं, पर नज़ारे वही,
जुबाँ में मीठा, मगर इरादे कहीं।
शिक्षा में ढील, स्वास्थ में चीख,
जनता लाचार, व्यवस्था अधिक।
माँ की ममता को अस्पताल नहीं,
बच्चे को पढ़ाने को स्कूल ढंग का कहीं।
गाँव में उजाला कम, अंधेरा अधिक,
शहरों में सपने पर, मजबूरी की लकीरें लिख।
पर ये मायूसी स्थायी नहीं,
बिहार की मिट्टी गवाही दे कहीं।
उठेगा फिर से, बोलेगा ज़ोर से,
"मैं वही हूँ जो इतिहास में चमका था सूरज के भोर से।"
जिसने अशोक को बदला था धर्मराज में,
जिसने लिखा था गणित को हर अंदाज़ में।
आज अगर अंधेरा है, तो सूरज भी यहीं है,
खामोश है जुबाँ, पर साज़ अभी भी कहीं है।
माटी की सौंधी गंध में है परिवर्तन की चाह,
बिहार उठेगा — ये वादा है, निबाह।
