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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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भविष्य मैं

भविष्य मैं

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मंदिर से लौटी कामना जी अपने कमरे में जा रही थीं कि रेखा बोली," मम्मी आज से आप उर्जित वाले कमरे में रहेंगीं। आप का समान उर्जित ने उसी कमरे में लगा दिया है।" 

"ऐसा क्या हुआ रेखा कि मेरे पीछे से मुझे बताए बिना ही कमरा बदलने का फैसला ले लिया।" कामना जी ने पूछा।

"तभी उर्जित बाहर आ गया बोला, दादी, दादा जी तो अब रहे नहीं तो आप को डबल बेड वाले रूम की क्या ज़रूरत है।" 

"तो तू लेगा ये फैसला कि मुझे किस रूम में रहना है।"

"ऐसी बात नहीं है दादी मम्मी को आपसे ये सब कहने में शर्म आ रही थी इसलिए मैंनें बता दिया।"उर्जित बोला।

"और तेरे पापा को भी शर्म आ रही थी क्या वो ही बता देता।" कामना जी ने लाचार आवाज़ में पूछा।

"पापा को अभी नहीं बताया दादी शाम को बता देंगें।" उर्जित ने जबाव दिया।

रेखा अपना मुंह सीए खड़ी रही। हताश कामना जी उर्जित वाले कमरे में चली गईं। पंकज जी को गए अभी महीना भी नहीं हुआ बहु ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए। कितनी मुश्किलों का सामना करके ये तीन बेड रूम का फ्लैट लिया था पंकज जी ने। एक छोटा सा सर्वेंट रूम था जिस में उर्जित पढ़ता था नेहा को तो पूरा एक कमरा दे रखा था।

कमरे में जा देखा कि उनके कपड़े वहाँ रखे दीवान पर रखे थे लेटने की तीव्र इच्छा थी कपड़े उठा कर अलमारी में रखने लगीं सोंचा आराम से जमा लेंगीं।

तभी उनका ध्यान में पंकज जी के कपड़े आये जो वहाँ नहीं थे। सोंचने लगीं रेखा ने कहीं रख दिये होंगें। इस कमरे की अलमारी छोटी जो है। रेखा से पूछने बाहर आईं रेखा ने बताया पापा जी के कपड़े "गूंज" संस्था वालों को दे दिए।

सारा दिन उदास हो लेटी रहीं खाना भी नहीं खाया। बेटे ने घर आते ही माँ को उस कमरे में देखा तो सख्ती से रेखा से कमरा बदली के लिए पूछा। उर्जित, नेहा और रेखा सहम गए कुछ जबाव नहीं दे पाए। 

कामना जी बाहर आई और बेटे को शान्त करते हुए बोली, "मैंनें ही रूम बदलने की बात की है तू इतना क्यों भड़क रहा है। अब मुझे डबल बेड की क्या ज़रूरत तेरे पापा तो चले गया। मैंनें उनके सारे कपड़े भी "गूंज" संस्था को दे दिए बेटा।"

रेखा को गुस्से में घूरते हुए रजत ने पूछा, "तुम माँ को रोक नहीं सकतीं थी। पापा के कपड़े भी दे डाले इन्होनें। इतने बड़े घर में चार कपड़े भी नहीं रखे जा सकते।"

कामना जी बोली, "बेटा कोई ज़रूरत मंद पहन लेगा यहाँ क्या होता उनका अलमारी ही घेर रहे थे।"

रजत को समझते देर ना लगी कि माँ रेखा को बचा रही हैं।

"ज़रा तो शर्म की होती रेखा, बच्चे को क्या शिक्षा दी तुमने, आज का वर्तमान तुम्हारा भविष्य हो सकता है।"

माँ ने क्षमा मांगने का अवसर भी नहीं दिया सहजता से परिस्थिति को स्वीकार लिया।


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