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Kalpesh Vyas

Abstract Romance

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Kalpesh Vyas

Abstract Romance

भँवरा और रजनीगंधा

भँवरा और रजनीगंधा

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चंचल सा एक भँवरा था 

वो गहरी निंद में सोया था 

उसे देख कर यूँ लगता था 

मीठे सपनों में खोया था 


इतने में ही कही दूर से

प्यारी खुश्बू एक आ गई 

सोए हुए उस भँवरे को 

जाने-अनजाने जगा गई


बहक कर वो चंचल भँवरा 

खुश्बू की दिशा में ऊड़ने लगा

ऊड़ते-ऊड़ते न जाने क्यूँ 

दिल उस खुश्बू से जुड़ने लगा 


नज़दिक जा कर जो देखा तो 

दिल बाग बाग उस का हो गया 

रजनीगंधा के फूल देख कर

मानो मनमोहित हो गया 


जा कर बैठा वो फूल पर 

रिश्ता दिल का भी जुड़ गया

रंजनीगंधा के फूल से 

रसपान कर भँवरा ऊड़ गया 


जाते जाते चंचल भँवरा 

मिलने का वादा करता गया 

रजनीगंधा का मासूम फूल 

फिर ठंडी आहें भरता गया।


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