STORYMIRROR

Kalpesh Vyas

Abstract Romance

4  

Kalpesh Vyas

Abstract Romance

भँवरा और रजनीगंधा

भँवरा और रजनीगंधा

1 min
583

चंचल सा एक भँवरा था 

वो गहरी निंद में सोया था 

उसे देख कर यूँ लगता था 

मीठे सपनों में खोया था 


इतने में ही कही दूर से

प्यारी खुश्बू एक आ गई 

सोए हुए उस भँवरे को 

जाने-अनजाने जगा गई


बहक कर वो चंचल भँवरा 

खुश्बू की दिशा में ऊड़ने लगा

ऊड़ते-ऊड़ते न जाने क्यूँ 

दिल उस खुश्बू से जुड़ने लगा 


नज़दिक जा कर जो देखा तो 

दिल बाग बाग उस का हो गया 

रजनीगंधा के फूल देख कर

मानो मनमोहित हो गया 


जा कर बैठा वो फूल पर 

रिश्ता दिल का भी जुड़ गया

रंजनीगंधा के फूल से 

रसपान कर भँवरा ऊड़ गया 


जाते जाते चंचल भँवरा 

मिलने का वादा करता गया 

रजनीगंधा का मासूम फूल 

फिर ठंडी आहें भरता गया।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract