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बेटी

बेटी

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माँ की कोख में पल रही,

लड़ती हूँ अपने अस्तित्व की लड़ाई।

माँ मुझको तू जन्म दे,

मुझमें भी अनगिनत खूबी समाई।


किसी तरह संघर्ष कर जब मैं,

इस दुनिया में आई।

तो घर के हर कोने में,

अँधियारी सी छाई।


बेटे के जन्म पर जहाँ,

बजती थी बधाई।

उस घर में डंका बजता है,

लो फिर से छोरी आई।


ईश्वर ने तो हर जगह,

समानता ही है दिखलाई।

और सभी धर्म ग्रंथों में,

मैं देवी कहलाई।


फिर भी आज मैं अपने अस्तित्व की,

लड़ती हूँ हर पल ही लड़ाई।

किसी तरह मैं बड़ी हुई,

ब्याह के उम्र तक आई।


तो लोगों ने हर तरफ,

दुल्हे की बोली लगाई।

फिर भी दहेज से पेट न भरा,

तो मुझमें सैकड़ों कमियाँ दिखलाई।


ईश्वर ने तो हर जगह

समानता ही है दिखलाई,

फिर से आज मैं अपने अस्तित्व की,

लड़ती हूँ एक नई लड़ाई।


पूछती हूँ मैं

इस समाज के ठेकेदारों से,

मुझमें तुमको हर बार क्यों ?

कमी ही है देती दिखाई।


मैं तो कभी बेटी

कभी बहू तुम्हारी

बगिया ही महकाई।।


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