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शैलेन्द्र गौड़ कवि

Children

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शैलेन्द्र गौड़ कवि

Children

बदनसीब बचपन

बदनसीब बचपन

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बदनसीब बचपन है, उम्मीद पर जिंदा हूं!

खुले आसमान तले का मैं परिंदा हूं!!


भूख पेट की दौड़ाती रही मुझको!

गली मोहल्ले में घुमाती रही

मुझको !

सपने अधूरे हैं जिंदगी के मुश्किल है राहें!

चलता चला जा रहा हूं थामें समय की बांहे!!


मुझे मेरे नसीब से शिकायत

मैं पढ़ ना पा रहा हूं!

देख दुनिया का चमकता नसीब बस देखे जा रहा हूं !

बदनसीब बचपन ना करना किसी का विधाता !

कठिन है डगर सुनो, मंजिल ना दिखाता !


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