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Dr.Rashmi Khare"neer"

Abstract

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Dr.Rashmi Khare"neer"

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बचपन

बचपन

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बहुत बड़ा शहर मेरा

आज अपने शहर में

अपनों को ढूंढ़ती

अजनबी सा एक

अहसास होता मन मेरा

उन यादों में झरोखों में

खुद को तलाशती

बहुत बड़ा शहर मेरा


आज कहाँ से कहाँ

आ गया है हर कोई यहां

वो कह रहे उनका ये शहर

मेरा भी है ये शहर

पर यादें ही है मेरी

अपनी कोई नहीं यहां

बहुत बढ़ गया है शहर


हर कोई अनजान सा

यहां अपरिचित सा

एक मुस्कान के लिए तरसती यहां

हर चेहरे में अपनों को ढूंढ़ती यहां

आज मेरा शहर मुझसे अनजान सा

मै अपने ही शहर में अजनबी सी

मेरा शहर बड़ा सही

पर आज मेरा नहीं


ऐ "नीर"बहुत मुश्किल है अब यहां

रुखसत हो कुछ नहीं अब यहां

तुझसे ही अब तेरा पता पूछ रहा

बेगानी सी वजूद अपना ढूंढ़ती यहां

शहर मुझसे मेरा पता पूछ रहा

जहां बिताया बेहतरीन पल

उन गलियों का पता पूछ रहा


कुछ नही कही कुछ नहीं

मेरे कदमों के निशान भी नहीं

बहुत बड़ा ही सही मेर शहर

पर आज मेरा नहीं

ये अहसास हो रहा अब।

आज सच मै पराई हो गई

बहुत मुश्किल है अब आना....….


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