STORYMIRROR

Anjana Singh (Anju)

Abstract

4  

Anjana Singh (Anju)

Abstract

बचपन की वो सहेलियां

बचपन की वो सहेलियां

2 mins
766

बचपन की वो सहेलियां

बन जाती थीं कभी पहेलियां


बड़ी शिद्दत से हैं याद आती

दिल को थोड़ा बेचैन कर जाती


वक्त ने भले हमें दूर किया

पर वर्षों बाद पुनः मिला दिया


संग संग जो बचपन में खेली

याद आती है वो हंसी ठिठोली


 देख एक दूसरे को चहक उठीं

बचपन की फिर वही महक उठी


आज उम्र सबकी बढ़ने लगी

सभी अनुभवी लगने लगी


कितनी ही मस्तियां किया करतें थें हम

एक पल चुप ना रहतें थें हम


पर अब सभी सहेलियां थकने लगी

पुनः एक-दूसरे से जुड़ने लगी


सब के बाल हैं पकने लगे

पेट भी तों निकलने लगे


सब पर है कोई ना कोई जिम्मेदारी

सबको शुरू हुई कोई ना कोई बीमारी


हम जो बचपन में भागा करती थीं

अब चलते चलते रुक जाया करती हैं


हम सभी बच्चों की फिक्र में है लगी

कभी अपनी बीमारी के ज़िक्र में लगी


देखती हूं जब पुरानी तस्वीरें

 देख कर जी भर जाता है


समझ में नहीं आता कि

यह वक्त कैसे गुजर जाता है


याद करके वह सुनहरें दिन 

ऑंखों में बदली सी छा जाती है


आज जब सबको देखती हूं

 तो सब अधेड़ नजर आती है


कल के ख्वाब जो सजाए थे हमनें

आज हम गुजरे दिनों में खोने लगे


सच ही कहते हैं सब

आज हम बूढ़े होने लगें


फुर्सत होते हुए भी फुर्सत की कमी है

आज हम सहेलियों की आंखों में नमी है


आज फिर दिल की तड़प ने 

हम सहेलियों को है एक किया


पुनः मिलकर हम सहेलियों ने 

अपना दिन गुलजार किया


देख कर एक दूसरे को हम कुछ सोचने लगीं

सच में हम सहेलियां आज बुढ़ी होने लगी।


Rate this content
Log in

Similar hindi poem from Abstract