बातें कुछ अनकही
बातें कुछ अनकही
कुदरत की खूबसूरत नक्काशी है उसका चेहरा
देखलूं एक नज़र भर के जो उसका चेहरा, तो
खिला- खिला रहे मेरा भी चेहरा
रंग सांवला जिस पर मासूमियत भरी उसकी
मुस्कान ना जाने कितनी बार कर गई हाल मेरा
बेहाल वो नूर उसके चेहरे में जो छिपा, जो शायद सिर्फ
मुझे ही दिखा दुनिया देखे ऊपरी सूरत उसकी, पर मैं
चाहूं उसके मन में झांकना, देखना चाहूं उसकी
मासूमियत जो शायद औरों से छिपाए है वो,
जानना चाहूं हाल -ए-दिल भी उसका जो औरों
से छिपाए है वो, चाहूं मैं खोले वो राज़ अपने
गहरे मेरे सामने, और समेट लूं उन्हें मैं अपनी
स्मृतियों में, ना आने दूं एक भी आसूं उसकी
झील- सी आंखों में, जिनकी गहराइयों में डूबती
रही हूं हर बार और कर दूं इज़हार -ए- मोहब्बत उससे,
मगर डरता है दिल उसे खोने से
डर है फिर से नसीब ना होगा देखना चेहरा उसका
समझू मैं अपनी खुशनसीबी देखना रोज़ उसे
क्योंकि दिलदार की ज़ियारत इतनी आसान नहीं
ना जाने वो इस सच से वाक़िफ है कि नहीं
सोचा कईं बार करूं पूरा इसे, छोड़ दिया है अधूरा जिसे,
लेकिन कुछ बातें अधूरी ही अच्छी,
कुछ बातें अनकही ही अच्छी, कुछ मोहब्बतें
बगैर इज़हार ही अच्छी।

