STORYMIRROR

Prateek Tiwari (तलाश)

Abstract Drama Others

2  

Prateek Tiwari (तलाश)

Abstract Drama Others

बाज़ार

बाज़ार

1 min
319


घर ही अब बाज़ार हो गया

रिश्तों में व्यापार हो गया।


क़ीमत हो गयी हर तोहफ़े की

अब महँगा शिष्टाचार हो गया।


जीवन की है परिभाषा बदली

अब चोर ही थानेदार हो गया।


लिखता कुछ हूँ करता कुछ हूँ 

अपना भी ये व्यवहार हो गया।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi poem from Abstract