क़ुदरत
क़ुदरत
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फ़िज़ाओं में कैसा ज़हर हो गया है
कि ख़ामोश मेरा शहर हो गया है
वीरान हो गयी हैं रंगीन गलियाँ
न जाने ये कैसा क़हर हो गया है
बनायी थी क़ुदरत ने क्या ख़ूब दुनिया
ख़ुदगर्ज़ इंसान मगर हो गया है
परिंदे हैं दिलशाद रहने लगे अब
जवाँ फिर से बूढ़ा शजर हो गया है
लगी चीखने हैं समन्दर की लहरें
कि इंसान अपनी डगर हो गया है
जश्न-ए-मसर्रत में झूमें हैं जंगल
गुमशुदा जब से देखो बशर हो गया है
सकूँ की “तलाश” में फिरता प्रतीक
कि उसका ठिकाना भी घर हो गया है
