STORYMIRROR

Prateek Tiwari (तलाश)

Others

3  

Prateek Tiwari (तलाश)

Others

क़ुदरत

क़ुदरत

1 min
245

फ़िज़ाओं में कैसा ज़हर हो गया है

कि ख़ामोश मेरा शहर हो गया है

 

वीरान हो गयी हैं रंगीन गलियाँ

न जाने ये कैसा क़हर हो गया है

 

बनायी थी क़ुदरत ने क्या ख़ूब दुनिया

ख़ुदगर्ज़ इंसान मगर हो गया है

 

परिंदे हैं दिलशाद रहने लगे अब

जवाँ फिर से बूढ़ा शजर हो गया है

 

लगी चीखने हैं समन्दर की लहरें

कि इंसान अपनी डगर हो गया है

 

जश्न-ए-मसर्रत में झूमें हैं जंगल

गुमशुदा जब से देखो बशर हो गया है

 

सकूँ की “तलाश” में फिरता प्रतीक

कि उसका ठिकाना भी घर हो गया है



Rate this content
Log in