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Deepak Srivastava

Abstract

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Deepak Srivastava

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बाद मरने के सब ख़ाख़ हो जाता है

बाद मरने के सब ख़ाख़ हो जाता है

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दो - चार का हांथ देखकर वो 

हर रोज़ आने वाला कल बताता है 

लोग कहते है बड़ा जानबकार है वो 

खुद को, वो भी एक तिलस्मी बताता है !


छोटे - छोटे झूट झट से बोलकर 

वो बड़े से बड़ा सच छुपा जाता है 

वज़ूद कतमी सा, नादान है हुनरमंद 

जो आमावश की रात में चांदनी तलाशता है !


लगता है उसे कि वक़्त उसने बदला है

नहीं मालूम कि वक़्त खुद बदल जाता है 

सुना है, घड़ियों का क़ारोबार है उसका 

वक़्त को वो, माशूका की पाज़ेब मानता है !


वक़्त ढलते कीमतें गिरती है साहब 

यहाँ बिना मतलब इंसान गिर जाता है 

तलब रहती है सुबह - सुबह जिस अख़बार की 

शाम ढलते ही रद्दी के भाव बिक जाता है !


ना कर ग़ुरूर दौलत - शौहरत पर अपनी 

वक़्त बदलते इधर - उधर हो जाता है 

कुछ देर ग़मगीन होते हैं ये दुनिया वाले 

बाद मरने के सब दफ़न हो जाता है !


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