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ritesh deo

Abstract

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ritesh deo

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असफलता से प्रेम

असफलता से प्रेम

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सफलता के इस बाजार में

असफलता को दुत्कारा जाता है

जो गिर गया उस पर पैर रखकर

अपना जीवन संवारा जाता है...


असफलता नही यह कोई राक्षस है जैसे

माहौल ऐसा क्यों बना दिया है

ठोकर खाने वाला क्यों नही उठेगा

क्या किसी ने तुम्हें मना किया है?


होता है सफल जो

उसकी बोली लगती है

और जो हुआ असफल तो

शक्ल उसकी निराश

और भोली लगती है...


लेकिन "बेचारा" बनना

क्या तुम्हें कभी गवारा होगा

या फिर आत्मसम्मान से

जीना ही प्यारा होगा...?


समझदार हो तुम

इसलिये एक इशारा काफी है

पी जाओ आँसुओं को अपने

ऐसी हिम्मत रखने वाले को माफी है...


सोच बदल प्यारे

तब नज़ारे भी बदलेंगे

पतवार सही दिशा में ले चल

तब किनारे बदलेंगे....


असफलता इतनी भी बुरी नही

वह तो अपना "फ़र्ज़" निभाती है

बार बार तुम्हें सही राह दिखाकर

सफलता में तेरा साथ निभाती है...


जब तक सीखेंगे नही उनसे

जीवन में नाकामयाबियां आएंगी

हम कर्तव्य नही निभाते तो क्या

वे तो सदा अपना धर्म निभाएंगी...


असफलता का धर्म हमें "सिखाना" है

और हमारा कर्तव्य उनसे सीख जाना है

जब तक यह "आत्मसात" नही होगा

असफलता को जीवन में दोहराना है

असफलता को जीवन में दोहराना है

अतः भयभीत न हो असफलता से

गुरु बनकर वह हमें आगे बढ़ाती है

कुछ ठोकरों से वह अनमोल ज्ञान देकर

सफलता की "सीढ़ियां" चढ़ाती है...


इसलिये डरो नही अब असफलता से

नतमस्तक होकर उन्हें प्यार करो

सबक ही सिखाये है उन्होंने तुमको

कृतज्ञ होकर इसीलिये


उनसे प्रेम का इज़हार करो..

उनसे प्रेम का इज़हार करो..

असफलता के प्रति अपने दृष्टिकोण को बदलिये।


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