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Amarjeet Kumar

Abstract


3.0  

Amarjeet Kumar

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अपना नसीब

अपना नसीब

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हर जंजीर तोड़ते चलो, 

नदियों का रूख मोड़ते चलो ।

सितारों में दुनिया खोजना है, 

इस धरती को छोड़ते चलो ।

और ऊंचा बढ़ते चलो, 

बढ़ते चलो तुम बढ़ते चलो ।

मुश्किल कहां कुछ होता है, 

बेकार में तू ऐसे रोता है ।

चल पगले हंस ले खिलखिलाकर।

काहे को दुख संजोता है , 

अपना नसीब खुद गढ़ते चलो।

बढ़ते चलो तुम बढ़ते चलो , 

कंटक वन और पर्वत को पार करते चलो।

और ऊंचा बढ़ते चलो, 

लक्ष्य को प्राप्त करते चलो ।

भीड़ को चीरते चलो, 

आंधी-तूफान में रोशनी की मशाल बनते चलो ।

बढ़ते चलो तुम बढ़ते चलो ।


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