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संतोष ताकर "खाखी"

Abstract Action

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संतोष ताकर "खाखी"

Abstract Action

अपना घर जलाते हैं

अपना घर जलाते हैं

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एक हादसा और उठाते हैं, 

चलो अब तुम्हें भूल ही जाते हैं। 

लोग मंजिल तक क्यों नहीं पहुंचते, 

शायद रास्ते से लौट आते है। 

उनको प्यार तक नहीं नसीब होता,

जो यार पे अपना खून तक बहा देते है।

सियासत का खेल खेलने दो उनको,

चलो हम अपना राबता निभाते हैं।

जो अपना एक घर ना बसा सके,

वो हमें तामीर के किस्से सुनाते हैं।

चराग जलाने‌ से उजाला ना हो सका, 

चलो अब अपना घर जलाते हैं।।

                    


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