"अनमोल खजानों से भरी है कुदरत"
"अनमोल खजानों से भरी है कुदरत"
अनमोल खजानों से भरी है कुदरत,
पर मानवी को महसूस करने की कहां है फुरसत?
लगता है वो तो यंत्र सा बन गया,
जिम्मेदारी के बोझ के नीचे दब गया।
कैसे बीज से निकलता है सुंदर अंकुर,
पर्वत पर डाली ईश्वर ने श्वेत चादर।
सागर की लहरे खुशी से झूम रही है,
हवा हर नदी का बदन चूम रही है।
पंछी गीत खुशी के गा रहे है,
जैसे वो आसमा को मिलने जा रहे हैं।
बागो मे फूल नृत्य कर रहे हैं,
लगता है जैसे ईश्वर की आराधना कर रहे हैं।
भंवरे गुन गुना रहे है,फूलो के साथ गुफ्तगू कर रहे हैं,
लगता है जैसे,फूलो की चाहत में वो मर रहे हैं।
लगता है सारी खुशियां जमी पर ही बिखेर दी,
जैसे ईश्वर ने जमीं पर ही जन्नत दे दी।
अनमोल खजानों से भरी है कुदरत,
पर मानवी को देखने की कहां है फुरसत?
