अंगारों पर चलते चलते
अंगारों पर चलते चलते
अंगारों पर चलते चलते
जल गए पैर-
छलनी हुए
रिसने लगे घाव
थक गई मैं चलते चलते !
कदम कदम पर खाई ठोकर-
सुकुमार कहां थी मैं-
पर इतनी कड़ी भी नहीं
कि हर वार सह लूं,
मुंह से आह भी न निकले!
क्या मांग लिया मैंने ज़िन्दगी से
जो कर दिया उसने इन्कार
सीधी सादी , मामूली सी,छोटी सी
खुशियां थीं चाही,कुछ और नहीं
दो चार प्यार भरे, सुकून भरे रिश्ते-
थी चाह आज़ादी की , मिली बेड़ियां
चाहा था घर बार, जिसे मैं
सजा सकूं, संवार सकूं,सुन्दर बना सकूं
मिले ताने,अपमान,तिरस्कार
मैं 'मैं 'न रही, अंगारों पर चलती रही
पढ़ी लिखी हो तो क्या, अनपढ़ तो क्या
अंगारों का इंतज़ाम है किया हुआ
बच निकलने की गुंजाइश नहीं ,कभी नहीं
कुछ भी कर लो,कितना भी कर लो
खुश करना अपनों को है आसान नहीं
अपेक्षा अपनों की पूरी कर पाना ,है सपना
दिन दिन जटिल परीक्षा अपनी
जो अंगारों पर चल पाए बिना पैर जलाए
वह है सच्चा शूर वीर, परम धीर
समाज की हर चुनौती, जो करे स्वीकार
मगर मेरे मन की आवाज़ ने
मानी कब हार
समझाया प्यार से मुझे
अंगारों पर तो चल रहे हैं सभी
होती क्यों है तू परेशान
खुद को मजबूर समझना हैं कायरता
घाव भर जाएंगे ,कर इंतज़ार
फल होता है मीठा इंतज़ार का
दौड़ाई नज़र जब चारों ओर, खुल गईं आंखें
मैं अकेली कहां ,सभी हैं थके हुए
सभी चल रहे हैं अंगारों पर,हैं पावों में छाले
सभी की आंखों में झुलसे सपने
सभी हैं साथ तेरे,अब डरना क्या, शिकवा क्या ?
