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Manjeet Kaur

Abstract

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Manjeet Kaur

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अमृत धारा

अमृत धारा

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सृष्टि के आरम्भ से,  

अविरल प्रेम का अमृत बहे

सर्व के भीतर - बाहर

सम्पूर्ण जगत में अक्षुण्ण

कोई न रहा इससे अछूता

जो भी भीगा अमृत धारा में

आनन्द ही आनन्द छाया जीवन में 

लौकिक प्रेम सपने दिखाये

कल्पना की उडान भराये

आकाश में पवन सा उडाये

स्वार्थ, आशाएँ बाँधे

अपेक्षाए और उम्मीदें टूटें

जब सच्चाई को पहचाने

निर्मल प्रेम है अत्यंत दुर्लभ


बनाए विनम्र और दयालु

अहंकार को धूल चटाए

मन में बसे प्रभु के संग

सभी सम लगें प्यार लगें

पूरा संसार अपना सा लगे

कोई भेद न हो जाति का

निश्चल प्रेम बहे चहुँ ओर

लौकिन प्रेम करता व्यथित

कुंठित बढती, करती विकल

यह है मोह, जो दे केवल दुःख

अलौकिक प्रेम दे मुक्ति दुःखों से

छुटकारा दे आवागमन से

मैं भी प्यासी पथिक प्रेम की

चाहूँ प्रभु में इकमिक होना

यह तृष्णा है मेरे मन की

बन जाये न कहीं मृगतृष्णा

भव सागर से पार पाऊँ

प्रेम की धारा में बहूँ

विकारों से मुक्त होकर 

प्रभु की शरण पाऊँ।


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