अक्स की सादगी
अक्स की सादगी
सुनहरी ओढ़नी में वो छुपा एक नूर लगती है,
मगर इस आईने में वो ज़रा मगरूर लगती है।
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सहेजे कांच के टुकड़े, वो अपनी ही कहानी में,
दुआ में जो मुकम्मल हो, वही दस्तूर लगती है।
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हमने तो हाथ फैलाया, उसे तूफ़ां से रखने को,
मगर वो सादगी अपनी, छुपाने पर मजबूर लगती है।
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जो समझे दोस्ती को बस महज़ इक मोड़ चाहत का,
वही रूह आज महफ़िल में बहुत रंजूर लगती है।
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चमकती धूप सी साड़ी, और आँखों में ये तन्हाई,
वो हँसती है मगर दिल से ज़रा वो दूर लगती है।
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'सुहैल' तुम ढाल बन कर ही खड़े रहना हमेशा अब,
कि उसकी बेबसी में भी वफ़ा भरपूर लगती है।
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