तेरी मासूमियत के नाम
तेरी मासूमियत के नाम
तुम्हारी सादगी देखूँ या मासूमियत तुम्हारी,
ये दुनिया छल-कपट की है, तुम कितनी हो बेचारी।
💞
कोई भी खेल जाता है तुम्हारे नेक जज़्बों से,
तुम्हें तो अब भी लगती है ये सारी दुनिया प्यारी।
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नज़र आती नहीं तुमको किसी की चालें और साजिश,
मगर ये साफ़-गोई है तुम्हारी सबसे भारी।
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उन्हें लगता है तुम कमज़ोर हो, पर वो ये क्या जानें,
दुआएं साथ चलती हैं तुम्हारी बन के सवारी।
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जरा सा वक़्त लो लेकिन कलम को थाम लो फिर से,
तुम्हारी चुप से रोती है ये 'प्रतिलिपि' बेचारी।
💞
भरोसा फिर से जागेगा, सवेरा फिर से आएगा,
अभी जो रात काली है, वो ढलने की है तैयारी।
💞
चले आना कि साए की तरह हम साथ खड़े हैं,
तुम्हारी जीत की खातिर खड़ी है ये दुनिया सारी।
"(MOHAMMAD SUHAIL)"
