मान भी जाओ अब
मान भी जाओ अब
ज़रा सा देर क्या हुई, तुम तो खफ़ा हो बैठीं,
ख़ुद ही सवाल किया, ख़ुद ही सज़ा हो बैठीं।
💞
माना कि बिजली की तरह, उलझा रहा मैं काम में,
तुम तो रूठ कर अंधेरी, इक घटा हो बैठीं।
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कभी 'खड़ूस' कहा मुझे, कभी नखरे गिनाए मेरे,
अजीब तकरार है तुम्हारी, जो दवा हो बैठीं।
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सुहैल को आता नहीं, सलीका हुस्न-ए-बयाँ का,
मगर तुम्हारी ख़ामोशी, यहाँ मर्सिया हो बैठीं।
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चलो अब छोड़ो भी ये ज़िद, ये गुस्सा, ये दूरियाँ,
मेरी हर एक कहानी की, तुम ही इब्तिदा हो बैठीं।
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लिखूँगा फिर वही बातें, जो तुम्हें अच्छी लगती हैं,
तुम तो मेरी कलम की, मुकम्मल दुआ हो बैठीं।
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मैं मना लूँगा तुम्हें, चाहे कितनी भी तकरार हो,
तुम ही तो मेरी हर अधूरी नज़्म का, सिरा हो बैठीं।
💞
"(MOHAMMAD SUHAIL)"

