अजीब बरसात
अजीब बरसात
🌹अजीब बरसात 🌹
❤️ वियोग श्रृंगार में भीगा हुआ काव्य ❤️
✍️श्री हरि
🗓️13.9.2025
अजीब बरसात थी उस दिन...
मानो गगन का हर बादल
मेरी बांहों में छिपी तुम्हारी
मुस्कान बनकर खेल रहा हो।
हवा की हर सिहरन, तुम्हारी हँसी की गूँज,
और मेरे सीने से लगकर बिखरती हुई तुम्हारी महक—
सब मिलकर एक स्वप्निल जलप्रपात रच रहे थे।
मेरी आँखों के सम्मुख
आज भीतुम्हारी शोख निगाहों की
बिजली कौंध जाती है—
एक पल दहकाती, एक पल चौंकाती;
कभी डराती,
कभी प्रेम का नया क्षितिज खोल जाती।
उस दीप्ति में डूबकर लगता है
जैसे मेरी समस्त रातें
अनंत उजाले से भर उठी हों,
किन्तु वहीं अगला क्षण अंधकार का कटाव भी ला देता है।
तुम्हारे प्रेम की वह पहली बरसात,
जो उस दिन मेरे हृदय की
धरती पर बूँदों-सी बिखरी थी,
अब वही बरसात
स्मृतियों में टपक रही है।
हर बूँद तुम्हारी याद का अंगारा बन जाती है,
जो मन को शीतल करने की बजाय
आत्मा के भीतर धधकती ज्वाला भड़का देती है।
हाय ! वह अजीब बरसात!
जिसमें बूँदें शबनम बनकर चूमती भी हैं
और अंगार बनकर जलाती भी हैं।
तुम्हारी हँसी की लहरें
मेरे कानों में गूँजती हैं,तो लगता है
ऋतुराज स्वयं आकर बाँसुरी बजा रहा है;
किन्तु उसी लय में तुम्हारा विदा लेना
मानो सप्तसुरों का टूट जाना हो।
हृदय का आकाश अब प्रतिक्षण गर्जता है,
यादों की बिजलियाँ चमकती हैं,
और वियोग की बदली लगातार बरसती है।
यह बरसात केवल जल की नहीं,
भावनाओं की है—जहाँ तुम हो
तो इंद्रधनुष खिल उठता है,
और तुम नहीं हो तो ओस की बूँदें
आग बनकर टपकती हैं।
अजीब बरसात है यह...
जो बुझाती भी है, जलाती भी है,
लुभाती भी है, रूलाती भी है।
मेरे मन का हर कोना
अब उसी तुम्हारी छवि से भीग उठा है,
और मैं इस प्रेम-वियोग की वर्षा में
सदैव अपूर्ण खड़ा हूँ।

