अग्निपरीक्षा
अग्निपरीक्षा
आज बेशक़ गर्दिश में हैं सितारे मेरे...
मगर मुझको ये यक़ीन है गिरते-गिरते
कि एक वक़्त
मेरा भी आएगा,
जब मेरी क़ामयाबी की गूंज
दूर आसमान तक
सुनाई देगी...
और तब मैं देखूँगा
कि इस भीड़ भारी दुनिया में
रुपये और इंसानियत की
जंग-ए-जुनून में
शिकस्त किसकी होती है
और फ़तेह किसको मिलती है...!
हाँ, मैं ज़रूर जानना चाहता हूँ
कि इस अत्याधुनिक समाज-श्रृंखला में
खुद्दारी और खुदगर्ज़ी के मसले में
किसका पलड़ा भारी पड़ता है...
और किसकी हालत बुरी होती है...!!
ये अग्निपरीक्षा से उस निर्वाक
विधाता को भी गुज़रना है,
जिसने मुझ जैसे
खुद्दार इंसान की ज़िन्दगी की
ज़िंदादिली ही छीन ली...!!!
आखिर क्या गुनाह किया था मैंने,
जो अंधाधुंध दौलत न कमा पाया...?
क्या यही सज़ा है मुझ जैसे
हरेक ईमानदार इंसान की,
जिसने आज तक अपने फायदे के लिए
कभी बेईमानी की सरल राह न चुनकर
पसीने की कमाई की एक-एक बूँद
सिर्फ नेक काम में ही लगाया...??
क्या बिना रुपये के एक सच्चे दिलवाले
ईमानदार इंसान की कोई क़ीमत नहीं होती...???
क्या इंसान का शरीर भी केवल
रुपये की स्पर्श से ही सुधर सकती है...???
क्या जिनके पास
पर्याप्त धन-सम्पदा न हो,
क्या उनकी
कोई औकात नहीं होती...???
क्या रूपये-रूपये को मोहताज
हरेक इंसान बेदाम है, बेकार है...???
ये किसकी अग्निपरीक्षा है...
हरेक मुफलिस की, हरेक रईस की
या उस निर्वाक विधाता की...???
